पाठकों से निवेदन

इस ब्लोग पर तंत्र, मंत्र, ज्योतिष, वास्तु व अध्यातम के क्षेत्र की जानकारी निस्वार्थ भाव से मानव मात्र के कल्याण के उद्देश्य से दी जाती है तथा मैं कोई भी फीस या चन्दा स्वीकार नहीं करता हुं तथा न हीं दक्षिणा लेकर अनुष्ठान आदि करता हुं ब्लोग पर बताये सभी उपाय आप स्वंय करेगें तो ही लाभ होगा या आपका कोई निकट संबधी निस्वार्थ भाव से आपके लिये करे तो लाभ होगा।
साईं बाबा तथा रामकृष्ण परमहंस मेरे आदर्श है तथा ब्लोग लेखक सबका मालिक एक है के सिद्धान्त में दृढ़ विश्वास रखकर सभी धर्मों व सभी देवी देवताओं को मानता है।इसलिये इस ब्लोग पर सभी धर्मो में बताये गये उपाय दिये जाते हैं आप भी किसी भी देवी देवता को मानते हो उपाय जिस देवी देवता का बताया जावे उसको इसी भाव से करें कि जैसे पखां,बल्ब,फ्रिज अलग अलग कार्य करते हैं परन्तु सभी चलते बिजली की शक्ति से हैं इसी प्रकार इश्वर की शक्ति से संचालित किसी भी देवी देवता की भक्ति करना उसी शाश्वत निराकार उर्जा की भक्ति ही है।आपकी राय,सुझाव व प्रश्न सीधे mckaushik00@yahoo.co.in (read 00 as zero zero) पर मेल कीये जा सकते है।

Saturday, September 17, 2011

सारस्वत्य मन्त्र

मेरे स्वर्गीय पिता श्री हीरालाल कौशिक जो राजस्थान प्रशासनिक सेवा के एक उच्च अधिकारी थे तन्त्र मन्त्र में विशेष रूची रखते थे सौभाग्य से उनकी हस्तलिखित डायरी जिसमें काफी दुर्लभ मन्त्र लिखें हैं मेरे पास है यद्पि डायरी काफी फटी हुयी है तथा कुछ पृष्ठों की स्याही सिलन से मिट भी गयी है परन्तु उस खजाने से कुछ जनोपयोगी सामग्री में अपने ब्लोग पर डाल सकता हुं।
तो आज उसी खजाने से सारस्वत्य मन्त्र पेश है जिसका अभ्यास आने वाले शारदीय नवरात्रों से विधार्थि व प्रतियोगिता परीक्षा देने वाले कर सकते हैं।
डायरी के अनुसार इसकी केवल एक माला ( 108 जाप) प्रतिदिन करना पर्यापत है।
”ॐ ह्रीं श्रीं वद् वद् वाग्वादिनी भगवती सरस्वति मम विधां देहि देहि स्वाहा”
यहां थोड़ा उच्चारण पर स्पष्ट कर दूं कि संस्कृत में अनुस्वार का उच्चारण म हो ता है अर्थात ह्रीं का उच्चारण हीरिम व श्रीं का उच्चारण श्रीम तथा विधां का उच्चारण विधाम होगा।
यह मन्त्र कितना प्रभावी है मैने कभी उपयोग नहीं किया अतः जो पाठक उपयोग करें वो कृपया कमेंटस में बताने की कृपा करें कि उनको इससे लाभ हुआ 

Saturday, September 3, 2011

केमिकल लोचा-सांई बाबा मुझसे बोले ???? अतिंम भाग

इस आलेख के पिछले तीन भाग पढने के लिये यहां क्लिक करेंः-








इसके पश्चात उन्होने अतिंम उपदेश के रूप में कहा कि सदैव ध्यान रखो कि आत्मविश्वास ही भगवान है इसलिये मन को कभी कमजोर मत होने दो सदैव अच्छा व सकारात्मक ही सोचो व सकारात्मक वाक्य ही मुह से बोलो , किसी की निन्दा चुगली मत करो व कभी भी दूसरों के कार्य में हस्तक्षेप मत करो यदि तुम इनका ध्यान रखोगे तो मैं भी तुम्हारी सहायता कर सकुगां अपने मन को मुझ में लगाये रखकर अपने आप का कर्ता न मानकर मेरे द्वारा सौंपे गये कार्यों को करो जब तुम्हारा रोल यहां से पूरा हो जावेगा तो तुम्हें तुम्हारी निष्ठा के अनुसार अपने आप अच्छे स्थान पर पहुंचा दिया जावेगा।
मुझे बड़ा आघात लगा क्यों कि मैं तो प्रत्यक्ष चम्तकार की आशा लगा रहा था कि चुटकी बजाकर बाबा कोई आरामदायक जगह का ओर्डर बना देगें फिर मौजां ही मौजां
साथ ही निन्दा किये बगैर तो मेरी रोटी ही हजम नहीं होती मेरे दोस्त भी मेरे मुहं से नमक मिर्च लगायी हुयी निन्दाएं सुनकर ही मेरी प्रशंसा करते हैं जिनका विषय सरकार से लेकर बाबा रामदेव व अन्ना हजारे जी होते हैं या बोस की निन्दा करना सदैव आनंददायक होता ही है।
यदपि मुझे लगा कि यह सब मानसिक रोग ही है कलियुग में कोई चमत्कार की बात करना मूर्खता है फिर भी बाबा के बताये आदेशानुसार पालन करने के सिवाय कोई चारा भी नहीं था इसलिये इन ओदशों पर चलने का प्रयास करने लगा ( प्रयास शब्द ही जायज है क्यों कि यह बहुत मुश्किल आदेश हैं खासकर निन्दा वाला क्यों कि न चाहते हुए भी मैं माननीय मुख्यमंत्री से लेकर मेरे माननीय बोस व साथियों के आचरण व विचारों पर टिप्पणी करने से अपने आप को रोक नहीं पाता तथा टिप्पणी करने के बाद लगता है कि यह तो निन्दा की परिभाषा में आ रही है तो कह देता हुं सोरी सार्ईं बाबा मैं आगे से ध्यान रखूंगा।
खैर इन सबका जहां तक संभव हो सका पालन करने पर मेरे साथ क्या हुआ ये जरा गौर फरमाईयेः-

  • स्वाद के लिये न खाकर स्वास्थ्य के लिये खाने का ध्यान रखने लगा मीठा खाना कम कर दिया यदपि मुझे डायबिटीज नहीं है फिर भी मीठा कम से कम खाने लगा जिससे शरीर पूर्ण स्वस्थ हो गया।
  •  8 माह में दो करोड़ रूपये की बैंक ऋणों की वसूली भगवान ने मुझे माध्यम मान कर करवायी जिस पर राज्य सरकार ने मुझे एक लाख रूपये की नकद प्रोत्साहन राशि इनाम के तौर पर दी।
  •  असहयोग करने वाले कार्मिक कार्य व पराक्रम देखकर अपने आप भक्त हो गये।
  •  एक ठाकुर साहब जो वसूली करने वाले टी आर ए को उठाकर ले जाने की धमकी दे रहे थे चुपचाप आकर मय ब्याज सारी बकाया चुकता कर के चले गये।धन्यवाद ठाकुर साहब आप तो बहुत भले आदमी लगते हैं।
  • जो सज्जन 722 लाख रूपयों की वसूली वाले थे वो माननीय हाईकोर्ट की शरण में चले गये।
  •  ओडिट पैरे आदि तो धड़ाधड़ बंद होने लगे तब मुझे अहसास हुआ कि वास्तविक कर्ता कौन है।
  •  छोटे मोटे कार्य तो ऐसे हो गये कि मुझे कोई भार ही महसुस नहीं हो रहा था।
खैर आप जानते ही हैं कि मैं कितना डरपोक हुं इसलिये यह वैधानिक चेतावनी नोट कर लेवें कि इस कहानी के सभी तथ्य काल्पनिक है तथा वास्तविक घटनाओं से इनका कोई संबधं नहीं है यदि फिर भी किसी को वास्तविक लेगे तो संयोग मात्र है जिसके लिये मैं क्षमा चाहता हुं।


अपडेटः-( 2012) इस आलेख को लिखने के 1 वर्ष बाद जुन 2012 में जब नोहर की तहसील राजस्व लेखा शाखा का कार्य लगभग सुचारू हो गया ( जो कि मैनें नहीं किया मैं तो एक दर्शक मात्र था इसमें उस उपरवाले के हजार हाथ काम कर रहे थे जैसा कि गाना है सांईनाथ तेरे हजारों हाथ....) उस समय जुन 2012 में मेरा स्थानांतरण वापस मेरे मूल पदस्थापन स्थान पिण्डवाड़ा हो गया इस 2 वर्ष की नोहर यात्रा 2010 से 2012 में मैनें जो कुछ सीखा वो आपसे यहां साझा किया आप भगवान को माने या ना मानें मेरे को तो हर वक्त भगवान की शक्ति महसुस होती है। 

Saturday, August 20, 2011

अन्ना हजारे नहीं अन्ना करोड़े हैं।पर बाबा रामदेव कहां है???

अब मुझे लगता है जब अन्ना को हजारों लोग जानते थे तब वो अन्ना हजारे थे आज तो करोड़ों लोग उनके साथ हैं तो उनको अपना नाम अन्ना हजारे से अन्ना करोड़े कर लेना चाहिये। मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि हमेंशा भगतसिंह व चन्द्रशेखर आजाद की तरह बलिदान के गाने बजाने वाले व देश के लिये बलिदान होने की चीख चीख कर बात करने वाले बाबा रामदेव को जब बलिदान देने का समय आया तो वो मंच से कुदकर भाग लिये।


दुसरी बार बलिदान देने का समय आया तो उन्होने जूस पीकर अनशन ही समाप्त कर दिया ( क्षमा करना बाबा रामदेव जी मैं आपका विरोधी नहीं भारत स्वाभिमान का सदस्य हुं तथा केवल मेरे मन में आयी शंका को ही व्यक्त कर रहा हुं आपकी देशभक्ति असदिंग्ध है)


अब फिर मौका आया तो स्वामी जी हरिद्वार में मोर्चा निकाल रहें है यह उसी प्रकार है कि मैं मेरे घर के एक कमरे से दुसरे कमरे तक अपने बोस के खिलाफ मोर्चा निकालूं ।


बाबा जी जब से आप पर साढेसाती आयी है। ( यह मजाक नहीं है तुला राशि पर वास्तव में साढे साती चल रही है) आपको पता नहीं क्या हो गया है।


पाठक क्या कमेंटस करके मुझे समझाएगें कि बाबा रामदेव खुलकर अन्ना करोड़े ( जल्द ही अन्ना अरबे) जी के साथ क्यों नहीं आते??????

Saturday, July 23, 2011

केमिकल लोचा-सांई बाबा मुझसे बोले ???? पार्ट तृतीय

अपनी बात को आगे बढाते हुये वे बोले कि तुं व्यर्थ ही ग्रन्थों व मेरे उपदेशों का अध्ययन करता है क्यों कि तुं उनको व्यवहार में नहीं लाता याद कर मेरे गुरू तो मेरे को रस्सी से बांध कर कुंए में उलटा लटका कर कहीं चले गये थें काफी समय बाद आकर उन्होने पुछा कि में कैसा अनुभव कर रहा था उस समय मेरा प्रत्युतर था कि मैं असीम आनंद की अनुभुति कर रहा था मेरा यह प्रत्युतर झूठ नहीं था वास्तव में मुझे मेरे गुरू की कृपा व शक्तियों पर पूर्ण विश्वास था मैं जानता था इसमें मेरा कोई हित है इसलिये मुझे बड़ा आनंद आ रहा था परन्तु तुझे तो मैने रस्सी से बांधकर कुंए में उल्टा नहीं लटकाया है फिर चीख पुकार क्यों ?

अबके मेरे पास कोई जबाब नहीं था।

उन्होने अपनी बात आगे बढायी वे बोले तुं हमेशा कहा करता था मैने इतने ओडिट आक्षेप निरस्त करवाये मैने इतनी वसूली करवायी मैने ये किया वो किया तेरी इस आत्मप्रशंसा को सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हो गया तथा मैने सोचा तेरे जैसे होशियार आदमी की तो इस कार्यालय में सख्त आवश्यकता है पर यहां आते ही तेरा वो पराक्रम तेरी वो होशियारी कहां चली गयी समझ में नहीं आता।
स्थितप्रज्ञ होकर पराक्रम दिखा वरना व्यर्थ चीख पुकार मत मचा मेरी फोटो के आगे बैठ कर घंटी बजाना भक्ति नहीं है मेरे द्वारा समय समय पर सौंपे गये कार्यों को पूरी निष्ठा व पराक्रम से करना ही भक्ति है।

क्रमशः......शेष अगले अंक में।
अगला भाग पढने के लिये निम्न लिंक पर जावें:-

केमिकल लोचा-सांई बाबा मुझसे बोले ???? अतिंम भाग


Sunday, July 10, 2011

केमिकल लोचा-सांई बाबा मुझसे बोले ???? पार्ट द्वितीय


पिछले अंक में आपने पढ़ा कि किस प्रकार मैं अनेक मुसीबतों से एक साथ घिर गया तथा अपने आप को बहुत बड़ा भगवान का भक्त समझने वाला मैं घबरा उठा पिछले अंक को पुनः पढने के लिये इस लिकं पर जाईये

Sai Baba mujhse Bole Part 1

बरहाल स्थिति को समझने के लिये मैं मेरे नये पदस्थापन स्थान के कुछ चित्र इस ब्लोग पोस्ट पर डाल रहा हूं ताकि आपको सही सही अंदाजा हो जावे कि मेरे पदस्थापन स्थान के हालात किस प्रकार के थे। 
मेरा मूल कार्य वसूली से संबधित है हालांकि यह कार्य मेरे स्वभाव से मेल नहीं खाता पर मेरी आजीविका इसी प्रकार की है टी.आर.ए को विभिन्न सरकारी बकाया बैंको के लोन वित निगमों के लोन जो नहीं चुकाते उन भले लोगों से वसूली करनी पड़ती है साथ ही किसानों से लगान व लोन आदि की वसूली पर नियत्रंण का कार्य टी.आर.ए के पास होता है इसलिए मेरे नवपदस्थापन पर कार्य ग्रहण करने के बाद एक तरफ तो मैं बुरी तरह बीमार होकर काम नहीं कर पा रहा था क्यों कि इस स्थान की विशेषता यही थी कि यहां जो आया वो या तो बीमार होकर उपर चला गया या अस्पतालों में सड़ता रहा यहां आने के कुछ ही समय बाद इसी अभिशाप के चलते मुझे अस्पताल में दाखिल होना पड़ा तथा फिर मेरे कूल्हे पर अनेक फुंसिया व दर्द तथा पीप से भरे फोड़े हो गये जिन पर जितने भी एंटीबायोटिक मैं जानता था असर नहीं कर रहे थे।
इसी बीच एक घटना ओर हो गयी एक भले आदमी 735 लाख रूपये पंजाब सरकार से उधार लेकर डिफाल्टर होकर आ गये जिनसे वसूली का दायित्व मुझे दे दिया गया मैने वसूली हेतु कुर्की कार्यवाही करने का नोटिस जारी कर दिया जिससे उनकी तरफ से अनेक प्रकार की खतरनाक व घातक अप्रत्यक्ष धमकिंया मुझे मिलने लगी। 
जिससे मेरे बॉस व सहकर्मि भी डरकर असहयोग करने लगे अब केमिकल लोचे पर वापस आते हैं।
यहां में एक बात रहस्य ही रखना चाहुगां कि यह केमिकल लोचा प्रत्यक्ष था या सपना था? सच था या झूठी कहानी है? केवल मन में उठे विचार है या उससे उपर का कोई स्तर है साथ ही कुछ अशों को मैने संपादित भी कर दिया है।इसलिये इन सब का निर्णय पाठक स्वंय कर लेवें ।
तो एक दिन ज्यादा चीख पुकार मचाने पर केमिकल लोचा हो ही गया सांई बाबा मुझसे बोले
क्यों व्यर्थ पुकार मचा रहा है तुझे क्या संकट है वस्तुतः यह सब दुख तेरे मन की स्थिति से बने हुये हैं?
 सभी रोगों का मूल कारण आहार विहार में अनियमितता व पूर्व जन्म के पापों का फल है।
अब मुझे विश्वास हो गया कि यह केमिकल लोचा ही है क्यों कि दोनों बातें कैसे संभव है या तो मेरा रोग आहार विहार से हुआ है या पूर्व जन्म के पापों से अतः मैने निवेदन किया कि आप एक बात बताएं दोहरे अर्थ की बातों से तो मैं ओर भी कन्फयूज हो रहा हूं।
बाबा ने कहा वस्तूत पूर्व जन्म या इस जन्म के पापकर्म ही सभी दुखों का मूल होते हैं परन्तु अकेले इनसे रोग नहीं होते यह पापकर्म मन में आहार विहार गलत करने की इच्छा उत्पन्न कर देता है तूं याद कर कि विगत मौसम में तैने लगभग रोज आम व आईसक्रीम तथा सरसों के तेल का सेवन किया है इसके परिणाम से यह फोड़े फुंसिंया है अब सभी प्रकार का मीठा खाना कुछ दिन तक त्याग कर तथा सरसों के तेल से बने प्रदार्थ का त्याग कर फिर एंटीबायोटिक का प्रयोग कर तो नई फुंसिया होनी बंद हो जावेगी।
अपने आप को कर्ता मानना बंद कर तथा ईश्वर की इच्छा से स्वतः होने वाले कर्मों को कर अंहकार का परित्याग करके तुं अपना कार्य इमानदारी से कर फिर कोई बात होगी तो मुझे देखनी है।
शेष अगले अंक में।
अगला भाग पढने के लिये निम्न लिंक पर जावें:-
केमिकल लोचा-सांई बाबा मुझसे बोले ???? पार्ट तृतीय




Saturday, July 2, 2011

केमिकल लोचा-सांई बाबा मुझसे बोले ???? पार्ट प्रथम


हाल ही में मैं मुसीबतों से बुरी तरह घिर गया मेरा ट्रांसफर 850 किमी दूर हो गया में बिलकूल भी परेशान नहीं हुआ क्यों कि मैं मेरे पुराने पदस्थापन स्थान से बोर हो गया था तथा कोई नया चैलेंज लेना चाहता था परन्तु नये स्थान पर जाने से पता चला कि वह पद तीन साल से रिक्त था तथा इससे पूर्व भी वहां कोई स्थायी पदस्थापन नहीं रहा था तथा यह भी बताया गया कि मेरी कुर्सी यहां बहुत ही अशुभ रही है एक टी.आर.ए के तो ज्वाईन करते ही दफतर की पुरानी कुसिर्यों की कील चुभ गयी जो कैंसर में तब्दील हो गयी जिससे वो छुटटी पर उतर गये तथा कुछ माह संर्घष करके परलोक सिघार गये।
एक टी.आर.ए साहब की आते ही दुर्घटना में टांग टूट गयी जिससे वो दो माह अवकाश पर रहे तीसरे का एक्सीडेंट हुआ जिससे वो चार माह अवकाश पर रहे तथा ट्रांसफर आदेश लेकर ही वापस लौटे।
दफतर के कुछ बदमिजाज चपरासी मुझसे उलझ पड़े बोले यहां जो आया है उसे जाना ही पड़ा है तो तुं किस खेत ही मूली है।(यह झूठ नहीं है वास्तव में ही तूं शब्द का प्रयोग किया गया था क्योंकि मेरी उम्र 37 वर्ष है पर में बच्चा सा लगता हूं तथा मेरे अलावा वहां सारे तीस मार खां ही थे तो उनका तूं कहना स्वभाविक था) दफतर के बाकी कर्मचारियों का हौसला भी बहुत बुलन्द था क्यों कि वो जानते थे की मेरी सीट पर कोई टी.आर.ए सुखी नहीं रहा है एक वास्तुविशेषज्ञ आए बोले कि आप अपनी सीट को यहां से बदल देवें तथा उन्होने मेरे पूरे दफतर में सभी अशुभ सीटों को बदल कर शुभ स्थानों पर करने की सलाह दे डाली में उनकी सलाह मानने को तैयार नहीं था क्यों कि मेरा विश्वास था जब मुझे यहां मेरे भगवान लेकर आये हैं तो मेरे लिये अच्छा ही होगा.....
परन्तु कुछ ही दिन बाद मेरे दस्त लग गये तथा मेरी सारी होशियारी फेल कर गये क्यों कि मैं जो भी देसी व अग्रेंजी दवा जानता था वो फेल हो गयी तथा मुझे अस्पताल में भर्ति होना पड़ा व छुटटी लेनी पड़ी।
कुछ  दिनों में स्वस्थ होकर वापस गया तो सारे समझदार वापस आये ओर मुझे मेरी बेवकूफी के लिये उलाहना देने लगे कि जब हमने पहले ही कहा था कि यहां आप नहीं रह सकते आज तक कोई नहीं रहा रहा तो काम नहीं कर सका ।पर मैने उनकी सलाहों को अनसूना कर दिया तथा यहां फाईलों के ढेर जिन पर पर धुल जमी हुयी थी में मिटटी झाड़ कर काम करने लगा तो मेरे कूल्हे पर बड़े बड़े फोड़े होने लगे तथा अब मुझे विश्वास हो गया कि यहां का श्राप बड़ा भंयकर है क्यों कि मेरी भक्ति भी फेल हो रही है अबके भी इन फोड़ों पर कोई दवा असर नहीं कर रही थी तथा भंयकर दर्द से में बैठ भी नहीं सकता था इसलिये फिर छुटटी लेनी पड़ी तो मैं घबरा गया तथा लगातार करणी माता व सांई बाबा को पुकारने लगा खूब चीख पुकार करके निराश होने पर एक दिन केमिकल लोचा मेरे दिमाग में हो गया सांई बाबा मुझसे बोले.......................क्या बोले पढिये अगले अंक में।
अगला भाग पढने के लिये निम्न लिंक पर जावें:-
केमिकल लोचा-सांई बाबा मुझसे बोले ???? पार्ट द्वितीय

Sunday, April 3, 2011

चैत्र नवरात्री में श्री देव्यथर्वशीर्ष की प्रभावकारी साधना



सर्वप्रथम अपने पाठकों से इस लेख को लिखने में हुये विलम्ब के लिये क्षमा चाहता हुं क्यों कि आज से चैत्र नवरात्रा प्रारंभ हो चुके हैं तथा सभंव है जब तक मेरे कुछ पाठक इस ब्लोग को पढ पावें तब तक दुसरा या तीसरा नवरात्रा आ जावे खैर उनके लिये भी मैं उपाय बताउंगा जो इस साधना को प्रथम नवरात्रा से नहीं कर सकेगें।
श्री देव्यथर्वशीर्ष को अथर्ववेद से लिया गया है अथर्ववेद में इसकी बड़ी भारी महिमा बतायी


गयी है इसके जाप से देवी की कृपा इतनी शीघ्र प्राप्त होती है कि साधक आश्चर्यचकित हो उठता है।
इस देव्यथर्वशीर्ष के जाप से पांचों अथर्वशीर्ष के जाप का फल मिलता है असल में वेदों में हिन्दुओं के पांच प्रमुख देवता माने गये हैं गणेश , दुर्गा , शिव , सुर्य व विष्णु अतः इन पांचों देवताओं के अलग अलग अथर्वशीर्ष बताये गये हैं परन्तु देवी के अथर्वशीर्ष के जाप से इन पांचों का फल प्राप्त होता है।
इसका सांयकाल में अध्ययन करने से दिन भर किये हुये पापों से मनुष्य मुक्त हो जाता है तथा दिन में अध्ययन करने से रात्रि में किये हुये पापों से मुक्त हो जाता है। असल में गीता में कहा गया है कि जैसे अग्नि में धुआं रहता है वैसे सभी कर्मों में पाप रहता है आप सड़क पर चलते हैं तो भी छोटे जीव जन्तु जाने अनजाने में आपसे दबकर मरते रहते हैं नौकरी करते हैं तो भी जाने अनजाने में दुसरों की निन्दा झूठ बोलना आदि कर्म परवश हो जाते हैं इनके कारण संचित हुआ पाप ही सभी दुखों का मूल है जिसके बीज चाहे इस जाप से नष्ट हो जाते हैं यहि इसका तात्पर्य है।
इसका दस बार जाप करने से मनुष्य इस जन्म के संचित कर्मों से मुक्त हो जाता है तथा 108 बार जाप करने से पिछले सभी जन्मों के संचित बीज जल जाते है।
स इसका ही सरल सा अनुष्टान करना है मैं ज्यादा जटिलता से पूजा करना नहीं बताता बस माता की प्रतिमा के आगे देसी घी का दीपक लगाएं घूप लगाएं तथा इस लिन्क से गीताप्रेष गोरखपुर की मूल दुर्गासप्तशती डाउनलोड कर लेवें इसमें पेज सं 44 पर श्री देव्यथर्वशीर्ष दिया है
जिसका हिन्दी अर्थ पहले पढ़ कर समझ लेवें कि आप देवी की किस रूप में उपासना करने जा रहें है इसके पश्चात पाठ संस्कृत में ही करना है उच्चारण गलत करने से भी कोई दोष नहीं है क्यों कि आपको छ बार सुबह व छ बार शाम को कुल बारह पाठ प्रतिदिन के हिसाब से कुल 108 पाठ इन नवरात्रा में करने हैं जो लोग इस लेख को विलम्ब से पढ रहें हैं वे उस हिसाब से संख्या बढ़ा लेवें कि 9 दिन में 108 पाठ पुरे हो जावें।
इसलिये जब तक आपके 108 पाठ पुरे होगें तब तक माता की कृपा से आपका उच्चारण अपने आप शुद्व हो जावेगा आपका पहला पाठ अनाड़ी संस्कृत ज्ञानी की तरह होगा परन्तु 108 वां पाठ पंडित की तरह होगा प्रयास करके देखिए यह पहला चम्तकार है।
इस उपासना के दौरान जो स्वप्न या प्रत्यक्ष अनुभव हों वे किसी को नहीं बता सकते परन्तु पति पत्नी आपस में बता सकते हैं उसकी मनाही नहीं है। हमारे कमेंटस में इतना जरूर बता देवें कि आपने यह उपासना की तो आपको लाभ हुआ या व्यर्थ गयी।

Saturday, January 22, 2011

रजनी की यादें

मैं कवि नहीं हुं तथा कविताएं नहीं लिखता परन्तु आज पुराने कागजों की सफाई करते समय एक कागज पर मैरे द्वारा 20 वर्ष पूर्व अपनी एक सहपाठी को देखकर लिखि गयी कविता याद मिल गयी।
मुझे अपनी उस सहपाठी से एकतरफा आकषर्ण था तब मैं 11 वीं कक्षा का विधार्थि था तथा गर्मियों की छुटिट्यां हो जाने से वो एकतरफा आकषर्ण ज्यादा जोर मारने लगा तब शायद ये कविता मैने लिखि होगी क्यों कि इस पर 05.05.1991 की दिनांक अकिंत है।
यहां मैं फिर उल्लेख कर दुं कि प्यार व्यार कुछ नहीं था शायद विपरित लिंग के प्रति मेरा एकतरफा आकर्षण था क्यों कि मैं अपनी भावनांए कभी भी व्यक्त नहीं कर पाता था तथा डर भी लगता था। आज वो कागज 20 वर्ष बाद वापस सामने आया तो सोचा मेरे ब्लोग पर डाल दुं क्या पता दुनिया के किसी कोने से वो सहपाठी इसे पढ ले तथा उस वक्त की मेरी भावना ( या बदनियति ) से आज अवगत हो जावे।
ये रही वो चंद लाईनेः-
पवित्र पावन सूरत जब देखी तुम्हारी
फिकी पड़ गयी क्षण भर में दुनिया सारी
कहते है मित्र छलावा है यह
जवानी के जाल का भुलावा है यह
पर तुम्हारी काली आखें कजरारी
होंठ जैसे गुलाब की क्यारी
इनको कैसे भुल सकता है कोई
तुम्हारे बिना कैसे जी सकता है कोई
रजनी अमर रहेगी यादें तुम्हारी
फिकी पड़ गयी क्षण भर में दुनिया सारी
आज मैं शादिशुदा हुं तथा 3 बच्चों का पिता हुं परन्तु अभी भी उतना ही डरता हुं इसलिये यह वैधानिक चेतावनी लिख देता हुं कि इस आलेख के सभी तथ्य काल्पनिक है तथा इनका वास्तविक घटनाओं से कोई संबंध नहीं है इसलिये वास्तविक घटनाओं से किसी भी मिलान को संयोग मात्र समझा जावे।

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